मैं बहुत हसीं हूँ
इधर जंगल ए ख्याल मैं
उधर उन्माद की नदी हूँ
उधर थिरकता हुआ हर पल
इधर ठहरी हुई सदी हूँ
उधर आस्मां को छूता हूँ मैं
इधर ज़र्रा ए मैं ज़मीं हूँ
उधर मैं , मैं हूँ
इधर मैं नहीं हूँ
अब कोशिश है ये सोचने की
के किधर मैं ग़लत हूँ
और किधर मैं सही हूँ .
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