Sunday, February 20, 2011

खंडहर

इन टूटे हुए पत्थरों की भी क्या हसीन कहानी होगी
कहते हो तुम खंडहर इसे
रही ये किसी के गुरूर की निशानी होगी
रोई होगी, हंसी होगी, इंसान के बदलते वक़्त पर
और हर वक़्त के इंसान की फितरत भी इसने जानी होगी
खड़ा हूँ मुखातिब इस खंडहर से मैं कमल
शुरू से हश्र तक मालूम इसे मेरी भी कहानी होगी II

तुम

किरणों का संसार समाया,
निश्चल प्रतिबिम्ब में गति की माया :
नयन तुम्हारे ओज बिखेरें ,
शुद्ध विशेषण हो तुम काया II

बसेरा

मिले वो बसेरा जो हो दरिया ए हिकमत करीब,
जहाँ ख्याल हर चिराग़ हो, हर चिराग़ हो अजीब;
अजीब हो कुछ इस कदर के नजीब सी मिसाल हो,
हबीब हो वोह जिस्म से और रूह से मशाल हो ;
बसेरे की दीवार बस हवा हो ख्वाबगाह की,
ख्वाबगाह भी ऐसी हो जो दे जगह पनाह की;
शहतीर एक आस हो ना सिरा जिसे नसीब हो,
नसीब हो बसेरा ये तो कौन तब रकीब हो II

दरिया-ए-हिकमत = river of wisdom
नजीब = noble
हबीब = sweetheart
शहतीर = beam support
रकीब = enemy

मैं

चारागाह के उस तरफ
मैं बहुत हसीं हूँ
इधर जंगल ए ख्याल मैं
उधर उन्माद की नदी हूँ
उधर थिरकता हुआ हर पल
इधर ठहरी हुई सदी हूँ
उधर आस्मां को छूता हूँ मैं
इधर ज़र्रा ए मैं ज़मीं हूँ
उधर मैं , मैं हूँ
इधर मैं नहीं हूँ
अब कोशिश है ये सोचने की
के किधर मैं ग़लत हूँ
और किधर मैं सही हूँ .